Sunday, 13 April 2014

रचनाकारों की दिशाहीन रचना

वर्तमान में हिंदी भाषी के दिग्गज कहाँ मिलते हैं?
प्रसाद,दिवेदी जैसे व्याकरण में बंधे साहित्य कौन रचते हैं?
साहित्यों का ढेर तो हजारो की संख्या में लगाते है
किन्तु उन साहित्यों में अनमोल खजाने नहीं लुटाते है
उनके साहित्यों से समाज में परिवर्तन नहीं मिलते हैं
न ही भाषा परिष्कृत, न ही ज्ञान के उसमे दीपक जलते हैं
बस दो पल के ठहाके के लिए ही तानाबाना बुनते हैं
चंद लोगो की वाहवाही पर स्वंय को संतुष्ट करते हैं
एक समय में साहित्य सृजन करने वाला ज्ञान का दीपक बनता था
आनंद सागर में ज्ञान और संस्कार के मोती भर जाता था
वो संसार से चला जाता किन्तु उसकी शिक्षा से उसका नाम रह जाता था
किन्तु आज तो साहित्यकारों को चमकने के लिए विशेष प्रबंध करना पड़ता है
रचना व वाणी से उनकी चमक नहीं परिधान से उनका परिचय मिलता है
आज के साहित्य सृजन करने वालो को क्या कहा जाये
समाज को कुछ देते नहीं तो समाज से कैसे सम्मान पाये
समाज को दो पल की हँसी देकर कैसे वो अमर हो जाये
इश्वर की ओर से नियुक्त शिक्षक शिक्षा देने में क्यों कंजूसी दिखाए
एक समय में आनंद,ज्ञान,शुद्धता का सागर बन जाती थी
भटके हुए जीवन को सही राह पर ले आती थी
जिसके कारण पुस्तक भी मनुष्य की सच्ची मित्र कहलाती थी
मनुष्य के लिए यह निस्वार्थ भाव की शिक्षक भी बन जाती थी
अन्य भाषाओ के कलाकारों ने अपनी कला से उसकी शुद्धता बनाई
न केवल लिपि तक सिमित अ
शुद्धता के प्रयास की सफलता के लिए किसकी शरण करे
पनी वाणी में भी मर्यादा बनाई
किन्तु हिंदी भाषी कलाकारों ने व्याकरण तक की मर्यादा नहीं निभायी
लिखने से मेरा आशय है उसमे कोई दिशा नहीं दिखायी
अन्य साहित्यकारों की शुद्धता एवम ज्ञान के कारण उनकी भाषा देश की सीमा पार कर गयी
हिंदी तो अपने जन्मस्थान में अपनों के बीच में बुरी तरह मर गयी
न भी शुद्धता का ध्यान रखते तो ज्ञान के मोती तो इस भाषा में भरते
भारतेंदु जी की तरह नाम पाते ऐसे ही गुमनाम रहकर ही न मरते
मुझ जैसे उभरते साहित्यकार शुद्धता को खोज कहाँ करे


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