Friday, 4 April 2014

नैतिक पत्तन

भारतीय संस्कृति का हनन हो रहा है|
भारत में ही उसका दमन हो रहा है|
लोग अब यह कहते हैं कि जमाना बदल रहा है|
किन्तु सत्य लोगो की नैतिकता का पत्तन हो रहा है
माता-पिता शिक्षक ने मार्गदर्शन करके गुरु का मान लिया है
आज यही स्थान भारतीयों में दूरदर्शन ने लिया है
एक जमाना जब चरित्र पर झूठा कलंक लग जाता था|
तो भारतीय व्यक्ति का सिर लज्जा से झुक जाता था
आज हर युवा खुलकर चरित्रहीनता का मार्ग प्रशस्त करता है
अपने कर्म को विजेता की भांति सुनाकर दुसरो में खोजता है
दुसरो के नैतिक पत्तन से अपनी चरित्र पत्तन की तुलना करता है
सामने वाले से अधिक पत्तन की सिथ्ती में स्वंय को योग्य समझता है
एक समय एसा था जब मर्यादा की सीमा रेखा में रहकर मानव महान बन जाता था
आज असीमित क्षेत्र पाकर भी मानव हैवानियत की सारी सीमाए पार कर जाता है
यदि उनको भारतीय संस्कृति का पाठ कोई पढ़ाता है
तो उत्तर में योगिराज कृष्ण का नाम ले जाता है
योगिराज ने प्रेमीबंधन आत्माओ को परमात्माओसे मिलाने के लिए रास रचाया
मित्रता को उन्होंने सुदामा और द्रोपदी के साथ धर्मानुसार ही निभाया
आज का भारतीय स्वार्थ की पूर्ति में जीवन की सुन्दरता को भूल गया
रिश्ते,मर्यादा,धर्म,उच्च चरित्र,गुण,भक्ति, अनमोल खजाने निगल गया
मै ये नहीं कहती कि योगिराज को आदर्श न बनाओ|
यदि बनाओ तो उनकी तरह धर्मानुसार सारा जीवन बिताओ
रिश्ते चाहे कोई भी हो उसमे सच्चा प्रेम बरसाओ
प्रेम तो भक्ति का ही दूसरा रूप है इसमें समर्पण भाव लाओ
इसका अर्थ यह कि लेना ही नहीं प्रेम नहीं, देना भी सिख जाओ
दुसरे कि बेटी जब तक दुसरे कि जिम्मेदारी तब तक मिटटी ही नजर आनी चाहिए
जब तक समाज के सामने वह अपना न ले तब तक सपना भी नहीं होनी चाहिए
जब तक वह एकाधिकारी प्रेम वाले रिश्ते में वह समाज के सामने न अपनाए
तब तक आपके अनमोल प्रेम तथा कोमल भावना की अधिकारी न बन पाए
प्रेम करो तो एसा करो जो जीवन को सार्थक बन जाये
जीवन के उदेश्य से भटकाने के बजाय वह उसे समझाए
प्रियतम वासना पूर्ति का साधन नहीं मुक्ति का मार्ग बन जाये
हो साधारण मनुष्य किन्तु ह्रदय रूपी मंदिर का देवता बन जाये





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