Wednesday, 2 April 2014

देश की दुर्दशा (नेताओ का चरित्र)



मेरे देश की दुर्दशा पर मुझे रोना आता है
इसके आंसू पोछने का हर पुरुषार्थ व्यर्थ जाता है|
हर कोई विश्व की नजर में आना चाहता है
किन्तु विश्व में से भारत का नाम मिटाना चाहता है|
किसी को नेता बनने की होड़ लगी है
देश के खजाने पर सबकी नजर गड़ी है
सर्वश्रेष्ठ मार्ग देशभक्ति की किसको पड़ी है
विश्व के आगे स्वंय को भारतीय बताकर इठलाना चाहता है|
किन्तु भारतमाता की अच्छी संतान बनने में लज्जाता है
नेता तो जुआरी की भांति चुनाव में भाग्य आजमाता है
जनता का मत उसके फेके हुए पासों का अंक माना जाता है
कभी मेरी मात्रभूमि माता के समान पूजनीय थी
राजा के सत्कर्मो के कारण यह विश्व में वन्दनीय थी
कभी इस भूमि पर एसा वातावरण होता था
देवता भी स्वर्ग छोड़कर इस पर मनुष्य बनता था|
राजा प्रजा को वात्सल्य भाव देकर सुखी करता था|
मात्रभूमि को माता मानकर इसकी सेवा करता था
आज यही भूमि बूढी,लाचार माता कि भांति तडपती है
अपने संतानों की एक प्यार की नजर के लिए तरसती है
किन्तु इसके वर्तमान जयेष्ठ पुत्र इसको निजी संपत्ति समझते हैं
हर दांव पूरा होने के बाद अगले दांव पर इसको गिरवी रखते हैं
महाभारत के पांड्वो ने अपनी पत्नी दांव पर लगाई थी
अपने कुल की विनाशलीला अपने हाथो से रचायी थी
किन्तु ये तो माता को ही दांव पर लगाते हैं
क्या होगा इनका भविष्य हम तो यह सोच भी न पाते हैं

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