Wednesday, 2 April 2014

अक्षर

अक्षर का इस जग में खेल निराला 
लगता है जैसे बंगाल का जादू काला
इसे जानने वाले अनपढ़ बन जाते विद्वानी 
जो कलम से चलाये वो बन जाये इतिहास 
जो जुबान से चलाये वो खोल जाये दिलो दिमाग के राज 
इसे चलाया रत्नावली ने तो तुलसी जैसे मिले कवि
मानव जीवन को चमकाने वाले बन गए रवि
संगीत से जब हुआ इसका श्रींगार
जल गए महान तानसेन जैसे संगीतकार 
शब्दों का लोहा तो माने हर अनपढ़ ज्ञानी 
इसके आगे न चले किसी की मनमानी 
जिसने पढ़ लिया ढाई अक्षर प्रेम का 
हो गया सारा जग मन से उसका 
ये तो है मानव जीवन की जान 
इसके बिना तो सारा जीवन सुनसान 
यह  न होता तो न होता ज्ञान विज्ञानं 
यह न होता तो न होता कबीर,रहीम,रसखान

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