Wednesday, 2 July 2014

युवा शक्ति

मनुष्य जीवन की हर अवस्था की सुन्दर है किन्तु युवावस्था की हर बात ही कुछ और होती है ये उम्र जिम्मेदारी के साथ जीवन की उन उपहारों से भरा होता है जो कुदरत मनुष्य को अपने आप प्रदान कर देती है जैसे स्वस्थ शरीर| इस उम्र की ताकत का गुणगान हमारा शास्त्र भी करता है विश्वामित्र जी स्वयम में शस्त्र के ज्ञाता थे किन्तु उन्होंने राम लक्ष्मण को तड़का वध को चुना उन्होंने तो दशरथ को भी चलने मना कर दिया इस शक्ति को पाकर हर व्यक्ति सोचता है ये कभी नहीं जाये वास्तव ये शक्ति इतनी ताकत ताकत रखती है ये चाहे तो इतहास बदल दे धरती का नक्शा ही बदल दे किन्तु इसे सही सही मार्गदर्शन की आवश्कता पड़ती है गलत संस्कारो में ये खुद के साथ साथ सब कुछ ही नष्ट कर देती है आज मेरी देश की दुर्गति का कारण यही है युवा शक्ति को आदर्श फिल्मो के नायक मिलते हैं जो लड़की को छेड़ते है कभी मेरे हिन्दुस्तान के युवाओ का आदर्श राम होता था मस्ती के लिए युवा साधू के अखाड़े में जाते थे वहां महात्मा समझाते थे रामचरितमानस में मेघनाथ को लक्ष्मण को इसलिए मार पाया क्योकि वो तेरह साल से एक योगी का जीवन जी रहा था मै आर्य समाज के आश्रम में रह कर पढ़ी हूँ वहां का जीवन देखा और जिया है मैंने| वहां पर पहलवान लड़की भी देखि है इसलिए मै मान नहीं सकती की लड़की भी कमजोर हो सकती है फिर एक लड़के की तो बात ही कुछ और है पर उसको कुदरत के उपहार को पाने के लिए साधना करना पड़ेगा उसको भारतीय जीवन शेली से प्रेम करना होगा अपने शास्त्रों के एक गूढ़ गूढ़ रहस्य को समझना होगा समझना होगा मन को वैराग्य का स्वाद चखाना होगा अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना होगा

Sunday, 13 April 2014

रचनाकारों की दिशाहीन रचना

वर्तमान में हिंदी भाषी के दिग्गज कहाँ मिलते हैं?
प्रसाद,दिवेदी जैसे व्याकरण में बंधे साहित्य कौन रचते हैं?
साहित्यों का ढेर तो हजारो की संख्या में लगाते है
किन्तु उन साहित्यों में अनमोल खजाने नहीं लुटाते है
उनके साहित्यों से समाज में परिवर्तन नहीं मिलते हैं
न ही भाषा परिष्कृत, न ही ज्ञान के उसमे दीपक जलते हैं
बस दो पल के ठहाके के लिए ही तानाबाना बुनते हैं
चंद लोगो की वाहवाही पर स्वंय को संतुष्ट करते हैं
एक समय में साहित्य सृजन करने वाला ज्ञान का दीपक बनता था
आनंद सागर में ज्ञान और संस्कार के मोती भर जाता था
वो संसार से चला जाता किन्तु उसकी शिक्षा से उसका नाम रह जाता था
किन्तु आज तो साहित्यकारों को चमकने के लिए विशेष प्रबंध करना पड़ता है
रचना व वाणी से उनकी चमक नहीं परिधान से उनका परिचय मिलता है
आज के साहित्य सृजन करने वालो को क्या कहा जाये
समाज को कुछ देते नहीं तो समाज से कैसे सम्मान पाये
समाज को दो पल की हँसी देकर कैसे वो अमर हो जाये
इश्वर की ओर से नियुक्त शिक्षक शिक्षा देने में क्यों कंजूसी दिखाए
एक समय में आनंद,ज्ञान,शुद्धता का सागर बन जाती थी
भटके हुए जीवन को सही राह पर ले आती थी
जिसके कारण पुस्तक भी मनुष्य की सच्ची मित्र कहलाती थी
मनुष्य के लिए यह निस्वार्थ भाव की शिक्षक भी बन जाती थी
अन्य भाषाओ के कलाकारों ने अपनी कला से उसकी शुद्धता बनाई
न केवल लिपि तक सिमित अ
शुद्धता के प्रयास की सफलता के लिए किसकी शरण करे
पनी वाणी में भी मर्यादा बनाई
किन्तु हिंदी भाषी कलाकारों ने व्याकरण तक की मर्यादा नहीं निभायी
लिखने से मेरा आशय है उसमे कोई दिशा नहीं दिखायी
अन्य साहित्यकारों की शुद्धता एवम ज्ञान के कारण उनकी भाषा देश की सीमा पार कर गयी
हिंदी तो अपने जन्मस्थान में अपनों के बीच में बुरी तरह मर गयी
न भी शुद्धता का ध्यान रखते तो ज्ञान के मोती तो इस भाषा में भरते
भारतेंदु जी की तरह नाम पाते ऐसे ही गुमनाम रहकर ही न मरते
मुझ जैसे उभरते साहित्यकार शुद्धता को खोज कहाँ करे


Sunday, 6 April 2014

नर्स

अस्पताल के हर गलियारे में नर्स घुमती नजर आती है 
विशेष पोशाक पहने मुस्कान के  साथ मरीज के पास जाती है 
दिल में आशीषो को पाने की तमन्ना आँखों में प्रेम लिए आती है
मरीज के साथ कोई विशेष रिश्ता नहीं फिर भी सम्पूर्ण समर्पण की भावना दिखाती है 
सेवा ईमानदारी कर्तव्यनिष्ठा ये सारे गुणों को अपना आभूषण बनाती है 
इन सारे गुणों के साथ वह अपना हर अनमोल पल मरीज की सेवा में लुटाती है 
मृत्यु रूपी रात्रि से जीवन रूपी खुबसूरत सवेरे की ओर ले जाती है 
ऐसा करने के लिए वो एडी से चोटी तक का बल लगाती है 
वह सोचती है कि उसे चाहिए ही कितना तन ढकने, पेट भरने, धुप, बारिश से बचने के अलावा 
यही आत्म संतोष उसकी भक्ति और वो स्वंय सन्यासी बन जाती है 
नर्स बनकर समाज को सेवा के साथ नेकी का पाठ पढाती है
बदले में इसी समाज से थोड़ी सी सम्मान कि लालसा जोड़े जाती है 
इंसान कि तरह नजर आये मगर फ़रिश्ते का चरित्र  दिखाती है
खुदा के पास रहने वाली खुशनसीब आत्मा बन जाती है 

गंगा की सफाई

वर्षो से भारतीय इतिहास का हिस्सा बनी है गंगा 
पापियों के पाप धोकर उनके मन को किया है चंगा 
सतयुग,त्रेता,व्दापर  बीते इसके घाट पर 
कलियुग को भी शरण मिली ढोंगियों के नाम पर 
तीनो युग के लोगो ने किया इसमें पूर्वजो का दाह संस्कार 
निभाई अपनी परम्परा पर इसकी पवित्रता न होने दी बेकार 
अब हुई है कलियुग की शुरुआत 
वक़्त ने दी है इसको कई सौगात 
वास्तव में अब ये पापनाशिनी कहलाती थी 
इसकी पवित्रता की कसम खायी जाती थी 
बुद्धिजीवी इस रहस्य का पता लगाते थे 
इसके पवित्र जल में औषधि के गुण गाते थे 
जहाँ से ये बहती हुई निकल जाती थी 
वहां पर ये अन्न धन के खजाने लुटाती थी 
भारतीयों के विश्वास की कोई सीमा नहीं 
देवियों के इसके समान पवित्र कोई दूजा नहीं 
सतयुग,त्रेता,व्दापर के पापों को धो डाला 
कलियुग के पाप ने इसका ही रंग काला कर डाला 
अब तो इसमें अपनी सफाई के लिए नाले खुलने लगे 
लोभी,स्वार्थी,नेता लोग अपनी चालें चलने  लगे 
हम करेंगे गंगा की सफाई अभियान सफल 
हम तो अपना भला करेंगे चाहे यह प्रयास हो विफल 
पहले तो था केवल कर्मो तक फैला 
किन्तु आज मन विचारों को कर रहा मैला 
कर्मो की गंदगी तो गंगा ने धो ली
किन्तु मन की गंदगी से ये भी मैली हो ली 
अगर इसमें शुद्धता बनाये रखना चाहते हो 
तो फिर क्यों नहीं इसमें नाले खुलने पर पाबन्दी लगाते हो 
ये तो है हमारे आस्था का प्रतीक 
इससे तो जुड़ा है हमारा अतीत 
इसके बिना तो हमारा पवित्र कार्य भी अधूरा
इसकी स्वच्छता के लिए साथ दो मन से पूरा 
इसमें लालच स्वार्थ की गंदगी न मिलाओ 
साधारण पानी से बदत्तर इसकी हालत न बनाओ  

Saturday, 5 April 2014

भारत माता की आवाज-हिंदी

जब भारत स्वंतत्र हुआ तो हिंदी राष्ट्र भाषा के रूप में अपनाई गयी
इसको शिक्षा,धर्म,साधारण बोलचाल के रूप में हर क्षेत्र में पहुचाई गयी|
जिन्होंने स्वंत्रता के लिए अपने निजी सुख का बलिदान कर दिया
उन्होंने अपनी आवाज बुलंद करने के लिए अंग्रेजी का अपमान किया|                            
मेरा भारत स्वंत्रता के बाद ऐसे बोले कि सारा जग सुनता रह जाये
उनके उत्तराधिकारी अंग्रेजी के ऐसे दीवाने कि नक़ल वर्णन किया किया जाये|
अंग्रेज कहते हैं कि उनके पूर्वज तो बन्दर हैं
किन्तु नक़ल का गुण तो हिन्दुस्तानियों के अन्दर है|
चले गये अंग्रेज यहाँ से खेल खून का खेल के
पर हिन्दुस्तानी बेठे हैं उनकी गन्दगी लपेट के|
यदि नकल का मन है तो महानायक की नकल करो
हर कर्म से पहले उसके परिणाम पर गौर करो|
अंग्रेजी सिखने के चक्कर में अंग्रेजो का चरित्र पड़ते हैं
अंग्रेजो की नकल में स्वंय को सबसे अलग समझते हैं|
अंग्रेजो के ह्रदय से पूछो क्या वो अपने समाज, जीवन से प्रसन्न हैं
यदि हाँ तो हमारे अतीत कि गौरवगाथा के लिए क्यों मरणासन्न हैं?
हमारे पूर्वजो के बारे में जानने के लिए भारत कि आत्मा की आवाज को बुलंद करते हैं
 वो भी उनकी तरह उच्च चरित्र,जीवन के सुखमय अंत को हमारे साहित्यों में पढ़ते हैं|
वो हमारी विरासत कि नकल करने के लिए लालायित हैं इसमें उनका दोष नहीं
उनके पास ऐसे पूर्वज, इसी ज्ञान की गंगा नहीं इसलिए मुझे उनसे कोई रोष नहीं
यह रोष तो मुझे हिन्दुस्तान के उत्तराधिकारियो से है
देश में रहकर इसकी जड़ अलग होकर इठलाने वालो से है|
वो हमारे पूर्वजो के चरित्र कि नकल करते हैं इसमें आश्चर्य नहीं
किन्तु हम तो ब्रम्हा के पुत्र मनु की संतान हैं इसमें दो राय नहीं|
फिर नकल करने लिए अपनी सर्वश्रेष्ठ संस्कृति क्यों नहीं अपने जीवन में बुनते
सब पर राज करने वाली राह को छोड़ बुद्धिहीनो कि तरह क्यों अनुचित राह को चुनते
मै ये नहीं कहती कि सुखमय जीवन के लिए प्रयास न करो
किन्तु प्रयास से पहले परिणाम पर ध्यान तो अवश्य करो|
जिस अतीत के खजाने के कारण हम हिन्दुस्तानी संसार में आदर पाते हैं
उस अतीत के साक्षात् दर्शन कराने वाली मधुर वाणी को क्यों दबाते जाते हैं|
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा सही राह पकड़ लो
इसको अपनाकर जीवन को कीर्तिमान कर लो|




  


Friday, 4 April 2014

नैतिक पत्तन

भारतीय संस्कृति का हनन हो रहा है|
भारत में ही उसका दमन हो रहा है|
लोग अब यह कहते हैं कि जमाना बदल रहा है|
किन्तु सत्य लोगो की नैतिकता का पत्तन हो रहा है
माता-पिता शिक्षक ने मार्गदर्शन करके गुरु का मान लिया है
आज यही स्थान भारतीयों में दूरदर्शन ने लिया है
एक जमाना जब चरित्र पर झूठा कलंक लग जाता था|
तो भारतीय व्यक्ति का सिर लज्जा से झुक जाता था
आज हर युवा खुलकर चरित्रहीनता का मार्ग प्रशस्त करता है
अपने कर्म को विजेता की भांति सुनाकर दुसरो में खोजता है
दुसरो के नैतिक पत्तन से अपनी चरित्र पत्तन की तुलना करता है
सामने वाले से अधिक पत्तन की सिथ्ती में स्वंय को योग्य समझता है
एक समय एसा था जब मर्यादा की सीमा रेखा में रहकर मानव महान बन जाता था
आज असीमित क्षेत्र पाकर भी मानव हैवानियत की सारी सीमाए पार कर जाता है
यदि उनको भारतीय संस्कृति का पाठ कोई पढ़ाता है
तो उत्तर में योगिराज कृष्ण का नाम ले जाता है
योगिराज ने प्रेमीबंधन आत्माओ को परमात्माओसे मिलाने के लिए रास रचाया
मित्रता को उन्होंने सुदामा और द्रोपदी के साथ धर्मानुसार ही निभाया
आज का भारतीय स्वार्थ की पूर्ति में जीवन की सुन्दरता को भूल गया
रिश्ते,मर्यादा,धर्म,उच्च चरित्र,गुण,भक्ति, अनमोल खजाने निगल गया
मै ये नहीं कहती कि योगिराज को आदर्श न बनाओ|
यदि बनाओ तो उनकी तरह धर्मानुसार सारा जीवन बिताओ
रिश्ते चाहे कोई भी हो उसमे सच्चा प्रेम बरसाओ
प्रेम तो भक्ति का ही दूसरा रूप है इसमें समर्पण भाव लाओ
इसका अर्थ यह कि लेना ही नहीं प्रेम नहीं, देना भी सिख जाओ
दुसरे कि बेटी जब तक दुसरे कि जिम्मेदारी तब तक मिटटी ही नजर आनी चाहिए
जब तक समाज के सामने वह अपना न ले तब तक सपना भी नहीं होनी चाहिए
जब तक वह एकाधिकारी प्रेम वाले रिश्ते में वह समाज के सामने न अपनाए
तब तक आपके अनमोल प्रेम तथा कोमल भावना की अधिकारी न बन पाए
प्रेम करो तो एसा करो जो जीवन को सार्थक बन जाये
जीवन के उदेश्य से भटकाने के बजाय वह उसे समझाए
प्रियतम वासना पूर्ति का साधन नहीं मुक्ति का मार्ग बन जाये
हो साधारण मनुष्य किन्तु ह्रदय रूपी मंदिर का देवता बन जाये





Thursday, 3 April 2014

ढांचा समाज का

समाज का स्वरूप चंद लोग ही बदलते हैं
जैसे सूरज अकेले ही जग में उजाला भरते हैं
एक ही शक्ति समाज को चलाती है
नेता के रूप में हमारे सामने आती है
इनमे से कुछ नेता बुराई का नेतृत्व करते हैं
देश,समाज,संस्कृति को खोखला करते हैं
एक तरफ तो सफ़ेद पोश बनकर सत्संग करते हैं
दूसरी तरफ ये जमाखोरों से विवाह करते हैं
जमाखोरी दुल्हन बन देश में आती है
भष्टाचार,रिश्वत को दहेज़ में लाती है
महंगाई को जन्म देकर दुःख की जननी बन जाती है
देश में भुखमरी,गरीबी बसेरा कर जाती है
इससे निपटने में जनता एडी से चोटी तक का बल लगाती है
फिर भी दुखो के सागर से पार नहीं पाती है
पेट के लिए जनता दिन रात जुटी रह जाती है
रिश्ते,संस्कार,प्यार ताक पार रखकर धन के पीछे दौड़ती जाती है
हर तरफ ये शोर सुनाई दे रहा है
समाज इंसानों का नहीं मशीनों का बन रहा है
त्याग,प्रेम, अपनापन सब समाप्ति की ओर अग्रसर हो रहा है
लालच कालसर्प की तरह आदर्श समाज को निगल रहा है
इसको बचाने के लिए अच्छे इंसान को नेता बनाओ
अपना धन सरकार के हाथ में देकर नुक्सान न उठाओ
अपने नगर की भलाई के लिए स्वंय सहायता समूह बनाओ